हमारा नेता कैसा हो ?
किवदंती है कि नंद वंश के राजा से नाराज चाणक्य ऐसे शख्स की खोज में थे जो नंद राजा का नाश कर सके। पाटलीपुत्र की गलियों में उन्हें एक सात-आठ साल का बालक खेलता मिला। नाम था चंद्रगुप्त। एक बड़ी सिंहासननुमा कुर्सी पर वह राजा की तरह बैठा था और भ्रष्ट व अन्यायपूर्ण आचरणों के बारे में ऊंची आवाज में नसीहतें दे रहा था। उसके चेहरे पर तेज और आवाज में बुद्धिमता व ईमानदारी देखकर चाणक्य को समझते देर नहीं लगी कि नेतृत्व के गुणों से संपन्न यही बालक वह राजा है जिसे वह खोज रहे हैं। वह उसे अपने साथ ले आए और सात-आठ साल के कठिन प्रशिक्षण के बाद वह बालक मौर्य वंश का शासक चंद्रगुप्त मौर्य बना। ढाई हजार साल पहले चाणक्य के जमाने में लोकतंत्र नहीं था। लाजिमी था कि वह ऐसा शख्स चुनें जिसमें नेतृत्व के जन्मजात गुण हों और जिसे प्रशिक्षण देकर राजा के कर्तव्यों के लिए तैयार किया जा सके। आज हमारे देश में लोकतंत्र है। जनता ही अपने शासक चुनती है। इस लिहाज से आज वोट डालने वाला हर नागरिक चाणक्य है। दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र में नागरिकों के कंधों पर यह जिम्मेदारी है कि वे चाणक्य की तरह योग्य और होनहार व्यक्ति को सरकार की जिम्मेदारी संभालने के लिए चुनें।
आजादी के बाद अब तक हुए चुनावों में देश की जनता ने अपने शासक चुनने में अक्सर कोई गलती नहीं की। मतपेटियों से या वोटिंग मशीनों से जनता का जो सामूहिक फैसला निकलकर आया, उसमें अक्सर श्रेष्ठ उम्मीदवार ही विजेता बने। चुनाव नतीजों के जरिये जनता ने हमेशा बताया है कि वह अपने शासक में कौन-से गुण देखना चाहती है।
आजादी के समय की पीढ़ी जवाहरलाल नेहरू के प्रति आसक्त थी और एक के बाद एक चुनावों में उन्हीं के नाम पर वोट देती थी, तो इसलिए कि वह पंडित नेहरू में उन गुणों को देखती थी जो वह अपने नेता में देखना चाहती है। सही है मतदाताओं ने परिवार के नाम पर लोगों को चुना, लेकिन सिर्फ तभी जब उनमें उन गुणों की छाया दिखाई दी। हाल के दशकों में कई बार जनता ने भ्रष्ट और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को भी चुना, लेकिन सिर्फ तभी जब उनके सामने विकल्प नहीं छोड़ा गया। जब भी विकल्प सामने हुआ है, लोगों ने बेहतर को ही चुना है।
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों से एक बार फिर जनता ने बताया कि वह अपने नेता में किन गुणों को पसंद करती है। इन चुनावों में तीन विजेता उभरे : उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, पंजाब में अकाली दल के सुखबीर बादल और गोवा में भारतीय जनता पार्टी के मनोहर पणिक्कर। तीनों की जीत के पीछे जटिल राजनीतिक समीकरणों और कारणों के अलावा उनके व्यक्तित्व के गुणों की भूमिका भी कम नहीं रही।
वे कौन-से गुण हैं जिन्हें देखकर इन राज्यों की जनता ने जीत इन नेताओं की झोली में डाल दी? ये उन गुणों से बहुत अलग नहीं हैं जिन्हें चाणक्य ने अच्छे शासक के गुण बताया था। वे उन गुणों से भी भिन्न नहीं, जो अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक में होने चाहिए। आइए देखते हैं वे कौन-से गुण हैं जो देश की जनता अपने नेताओं में देखना चाहती है।
विनम्र और मृदुभाषी
महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक और जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक प्रमाण हैं कि भारत की जनता ने हमेशा विनम्र और मृदुभाषी व्यक्तित्व को अपने नेता के रूप में पसंद किया है। बड़बोले और दंभी नेता आम तौर पर लोगों का समर्थन हासिल नहीं कर सके। जिन पार्टियों और नेताओं में अहंकार की झलक भी दिखाई दी, उन्हें अपने वोट से वंचित करने में लोगों ने कभी कोताही नहीं की। पिछले विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव मुकाबले में खड़े नेताओं की तुलना में ज्यादा विनम्र शख्सियत दिखाई दिए। एंग्री यंगमैन को सुनहरे पर्दे पर भले ही लोगों ने पसंद किया, लेकिन चुनाव के मैदान में नहीं। प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के बड़बोले नेताओं के विवादास्पद बयानों और मुद्राओं ने अखिलेश के व्यक्तित्व की विनम्रता को उभारने में मदद ही की। मीडिया में भी चुनाव से पहले उनकी कोई विराट छवि जनमानस में नहीं थी, इसने भी उनकी विनम्रता की छाप को गहरा किया। पंजाब में सुखबीर बादल और गोवा में मनोहर पणिक्कर आम जनता के बीच ज्यादा जाने-माने थे, लेकिन प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में उनकी छवि विनम्र नेता की थी। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कोई बड़ी गलती भी नहीं की जिससे विनम्रता की छवि को चोट पहुंचती।जनता को यह समझने में भी मुश्किल नहीं होती कि कौन वास्तव में विनम्र है और कौन दिखावा कर रहा है। इसीलिए एक बार बड़बोला और दंभी साबित होने के बाद जनता को दोबारा अपनी विनम्रता से कायल कर पाना राजनीतिज्ञों के लिए आसान नहीं होता।
सकारात्मकता
देश की जनता ने कई बार नेताओं और दलों को नकारा है और नकार के आधार पर मतदान किया है, लेकिन नेताओं के व्यक्तित्व में नकारात्मकता को वह अक्सर पसंद नहीं करती। लोगों ने प्राय: ऐसे नेताओं को ही चुना है जो दूसरों की कमियों पर जोर देने की बजाय अपनी राजनीति का पॉजिटिव एजेंडा सामने रखते हैं। यही कारण है कि महात्मा गांधी के भाषणों में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ लंबी तकरीरें नहीं मिलतीं। देश की जनता के सामने वह हमेशा बेहतरी का पॉजिटिव एजेंडा ही रखते थे।उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने पार्टी का प्रचार अभियान न तो मायावती सरकार के भ्रष्टाचार पर केंद्रित किया और न ही केंद्र की कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार के घोटालों पर। ऐसा करना मुश्किल नहीं होता, लेकिन इसकी बजाय उन्होंने राज्य के बेहतर भविष्य का एजेंडा सामने रखा। दूसरी पार्टियों ने उससे बेहतर एजेंडा पेश करने की बजाय नकारात्मक अभियान चलाए, इससे अखिलेश की राह आसान हो गई। पंजाब में भी सुखबीर बादल ने कांग्रेस के पांच साल पहले के शासन की कमियों पर फोकस नहीं किया। सत्तारूढ़ पार्टी होने के कारण इसकी सुविधा भी उन्हें ज्यादा नहीं थी। लेकिन बदलाव के नए विचार और नया एजेंडा रख पाने में कांग्रेस की विफलता उनके लिए वरदान बन गई।
निर्णय क्षमता
सही समय पर सही निर्णय लेने वाले नेताओं को देश की जनता ने हमेशा पसंद किया है। जरूरी फैसले लेने से कतराने और टालमटोल करने वाले नेताओं को और जो भी मिला हो, जनता का समर्थन अक्सर नहीं मिला। वैसे भी यह नेतृत्व क्षमता का पहला और अनिवार्य गुण माना जाता है। जवाहर लाल नेहरू दशकों तक जनमानस में लाडले बने रहे तो इसके पीछे उनकी निर्णय क्षमता भी बड़ा कारण थी।पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के एक फैसले ने जनभावना को उनके पक्ष में झुकाने में बड़ी भूमिका अदा की। जब उनकी पार्टी ने आपराधिक पृष्ठभूमि के लिए कुख्यात एक नेता को पार्टी में शामिल करते हुए उसकी उम्मीदवारी की सार्वजनिक घोषणा कर दी, तब उन्होंने अचूक और निर्णायक हस्तक्षेप किया। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ जाने से भी परहेज नहीं किया और इस फैसले को निर्णायक ढंग से बदला। इससे संदेश गया कि अखिलेश ऐसे नेता हैं जो समय पर सही फैसला लेने से पीछे नहीं हटते, पार्टी को गुंडाराज से मुक्त करने की उनकी घोषणाओं की विश्वसनीयता भी बढ़ी।
पंजाब में पिछले दो वर्षो में सुखबीर बादल को अपनी पार्टी का रूप-रंग बदलने के सिलसिले में बड़े और निर्णायक फैसले लेते लोग देख ही चुके थे। गोवा में मनोहर पणिक्कर ने पहली बार एक समुदाय विशेष के लोगों को खासी बड़ी संख्या में चुनाव में खड़ा करने का बड़ा फैसला करवाया जो उनकी पार्टी में आसान नहीं था।
विश्वसनीयता
किसी भी व्यक्ति का यह वह प्राथमिक गुण है जो अगर न हो तो दूसरे सभी गुण बेकार हैं। नेता का व्यक्तित्व अगर विश्वास करने योग्य न हो, न तो उसकी विनम्रता प्रभावित करेगी और न ही निर्णय लेने की क्षमता। मौजूदा वक्त में जब राजनीतिज्ञों की विश्वसनीयता आम तौर पर रसातल में है, तब नेताओं के लिए यह और भी जरूरी है कि वे अपने को विश्वसनीय बनाने के लिए अतिरिक्त जतन करें।अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की जनता का विश्वास हासिल कर सके तो इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वह अग्रपंक्ति की राजनीति में अपेक्षया नया चेहरा हैं। उनके पीछे लंबा राजनीतिक इतिहास नहीं है, जिससे उनकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई होती। पिछले डेढ़-दो सालों में पार्टी को नया रंग-रूप देते हुए उन्होंने जो फैसले लिए और जो काम किए, उनसे जरूर उन्होंने विश्वसनीयता अर्जित की।
गोवा में मनोहर पणिक्कर ने विरोधी दल के नेता के तौर पर और पंजाब में सुखबीर बादल ने पार्टी की दिशा बदलते हुए पिछले दो वर्षो में विश्वसनीयता हासिल की, उनके विरोधी उससे बड़ी लकीर उनके सामने नहीं खींच पाए।
जनता से जुड़ाव
सामंती वक्तों में जनता राजा से प्राय: यह उम्मीद नहीं करती थी कि वह लोगों के बीच दिखाई दे। इसीलिए अगर राजा किसी कारण से लोगों के बीच जाता था या भेष बदलकर प्रजा का हाल-चाल लेने निकलता था, तो वह किंवदंतियों और जनश्रुतियों का विषय बन जाता था। लोकतंत्र में जनता स्वाभाविक ही अपेक्षा करती है उनके प्रतिनिधि नियमित रूप से उसके बीच दिखाई दें।जब से राजनीतिज्ञों ने सुरक्षा के नाम पर अपने को जनता से काट लिया है और सत्ता की अट्टालिकाओं में कैद कर लिया है, तब से लोगों में ऐसे राजनेताओं का आकर्षण बढ़ा है जो जनता के बीच दिखाई देते हैं। गोवा में मनोहर पणिक्कर की जीत में इस बात ने भी खासी भूमिका निभाई कि वह जनता के लिए सहज रूप से सुलभ रहने वाले राजनेता रहे हैं। अखिलेश के सत्ता की अट्टालिका में कैद रहने का वैसे भी अभी तक कोई इतिहास नहीं है। उनकी साइकिल यात्राओं ने भी जनता के बीच होने की छवि में इजाफा किया। पंजाब में सुखबीर बादल भी इस मामले में अपने प्रतिद्वंद्वियों से बेहतर दिखाई दिए।
पढ़ाई लिखाई
चाणक्य ने राजा के शिक्षित होने पर खासा जोर दिया था। यह अलग बात है कि उस वक्त शिक्षा के पैमाने आज से भिन्न थे। बेटों को शिक्षित बनाने के लिए पिताओं को तो उनकी कई नसीहतें मिलती हैं। हमारे लोकतंत्र में आजादी के बाद नेताओं की औपचारिक शिक्षा पर अक्सर बहुत जोर नहीं दिया गया। न ही जनता ने नेताओं के ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट होने की कोई व्याकुल मांग की। इसका कारण यह था कि सरकार चलाने की बुद्धिमता को औपचारिक शिक्षा का मोहताज नहीं माना जाता था। इसके बावजूद संसद और विधानसभाओं में हमारे जनप्रतिनिधियों में शिक्षा का औसत स्तर लगातार बढ़ता गया है।आज जब देश में शिक्षा की आकांक्षा का एक विस्फोट-सा देखा जा रहा है, नए-नए कॉलेजों की बाढ़ आ गई है, कोचिंग सेंटरों की बहार है और बड़ी संख्या में युवा शिक्षा को महत्व दे रहे हैं, आश्चर्य नहीं कि नेताओं के शिक्षित होने को गुण की तरह देखा जा रहा हो। आश्चर्य नहीं कि अखिलेश यादव पर्यावरण इंजीनियर है, सुखबीर बादल ने प्रबंधन शास्त्र में डिग्री ली है और मनोहर पणिक्कर आईआईटी से उत्तीर्ण इंजीनियर हैं। सिर्फ यही नहीं कि लोग अपने नेता को उच्च शिक्षित देखना चाहते हैं, बल्कि वे ऐसे शिक्षित नेता को प्रमुखता देंगे जो अपनी शिक्षा का इस्तेमाल आम जन की भलाई और देश की समस्याओं के समाधान में करता दिखाई दे।
